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* पत्रकारों के अधिकार बनाम पुलिस का दुरुपयोग*

 

*(नेशनल एक्टिव रिपोर्टर्स एसोसिएशन (NARA) का कानूनी पहलू से विश्लेषण)*

लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका

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लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं है – यह जनता की जवाबदेही है। अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप, रिश्वतखोरी, कालाबजारी जैसी बातों को सामने लाना एक पत्रकार का कर्तव्य है। जनता की ओर से सवाल उठाने वाला चौथा स्तंभ मीडिया है।

अगर कोई सरकारी कर्मचारी रिश्वत लेकर करोड़ों रुपये की संपत्ति जमा कर लेता है, तो पत्रकार उस पर लिखना अपराध नहीं है – यह लोकतंत्र की रक्षा में पवित्र कर्तव्य है।

*कानूनी अधिकार*

🏛️ भारतीय संविधान

अनुच्छेद 19(1)(क): हर नागरिक को बोलने, विचार व्यक्त करने, प्रकाशित करने की स्वतंत्रता है। इसमें पत्रकार भी शामिल हैं।

अनुच्छेद 19(2): इस स्वतंत्रता पर सीमाएँ हैं, लेकिन वे ‘सामान्य शांति, राष्ट्रीय सुरक्षा, न्यायिक निर्णयों में बाधा, बदनामी’ तक ही सीमित हैं। भ्रष्टाचार का खुलासा करना इनमें से कुछ भी नहीं है।

*🏛️ सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय*

1. श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015)

केवल ‘असहज’ शब्दों के लिए मुकदमे नहीं चलाए जाने चाहिए, ऐसा फैसला।

पत्रकारों पर FIR दर्ज करके डराना संविधान विरोधी है।

2. सुब्रमण्यन स्वामी बनाम भारत संघ (2016)

किसी अपराध में बदनामी एक अपराध है, लेकिन यदि बिना आधार के आरोप लगाए जाएँ तो नहीं।

ईमानदारी से लोकतंत्र के लिए भ्रष्टाचार पर लिखी गई कहानियाँ, यदि जनहित में हों तो बदनामी नहीं है।

3. सिद्धार्थ वरदराजन / द वायर मामला (2025, असम FIR)

धारा 152 बीएनएस के तहत FIR दर्ज करने पर भी, सर्वोच्च न्यायालय ने पत्रकारों की रक्षा करते हुए कहा कि ‘जनहित में लिखी गई कहानियाँ मूल रूप से राजद्रोह/अपराध नहीं हैं’।

*पुलिस द्वारा किया जा रहा दुरुपयोग*

व्यावहारिक रूप से, अधिकारियों पर लिखी गई लेखों के प्रतिशोध में:

गलत FIR

आईपीसी 500 (बदनामी) या आईटी एक्ट का दुरुपयोग

अपराधिक धमकी के मामले दर्ज किए जा रहे हैं।

यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बताई गई ‘कानून का दुरुपयोग या दुरुपयोग’ में आता है।

*पत्रकार कानूनी रूप से कैसे लड़ सकते हैं?*

1. उच्च न्यायालय में 482 क्रपीसी याचिका

यदि गलत FIR है, तो उसे रद्द करने के लिए याचिका दायर की जा सकती है।

उदाहरण: आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने पहले ही कई मामलों में मीडिया/सोशल मीडिया पोस्टों पर गलत FIR को रद्द कर दिया है।

2. रिट याचिका (अनुच्छेद 226/32)

‘स्वतंत्र भाषण का अधिकार’ का उल्लंघन होने पर उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय से राहत मिल सकती है।

पुलिस अत्याचार/सताए जाने पर मंडामस की रिट मांगी जा सकती है।

3. प्रेस परिषद ऑफ इंडिया/पत्रकार संघ

आधिकारिक शिकायत करने से सरकार को जवाब देने के लिए प्रेस परिषद आदेश दे सकती है।

4. मुआवजे का दावा

गलत मामलों से छवि को नुकसान पहुँचने पर, पत्रकार बदनीयती मुकदमेबाजी केस दाखिल करके अधिकारियों/राज्य से मुआवजा प्राप्त कर सकते हैं।

*पत्रकार का अधिकार – सर्वोच्च न्यायालय बनाम पुलिस*

सर्वोच्च न्यायालय: जनहित में भ्रष्टाचार की खबरें लिखना पत्रकार का अधिकार है। पुलिस इसे रोकना अनुचित है।

पुलिस: अधिकार का दुरुपयोग करके ‘मामला दर्ज करके चुप कराना ही’ लक्ष्य है।

इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने कई फैसलों में मीडिया की स्वतंत्रता का समर्थन किया है, ‘कानूनों का दुरुपयोग होने पर उन्हें रोक देंगे’ यह स्पष्ट किया है।

*समाचार लेखन अपराध नहीं है – भ्रष्टाचार अपराध है।*
जनता के लिए लड़ने वाले पत्रकारों को मामलों की धमकियों में नहीं आना चाहिए। उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय, संविधान सब मदद करते हैं।
लोकतंत्र की रक्षा कलम करती है – उसे चुप कराने के लिए तलवार (मामले) का इस्तेमाल किया जाए तो अदालत कलम की जीत का प्रमाण देगी।

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